Battle of Chamkaur

Battle of Chamkaur: भारत का गौरवशाली इतिहास वीरगाथाओं से भरा हुआ है. इस मिट्टी के लिए लाखों वीर सपूतों ने अपनी जान हंसतें-हंसतें गंवा दी. भारतवर्ष के उगते सूरज और ढलती शामों ने न जाने कितने युद्धों की चिंगारियों को ज्वाला का रूप बनते हुए देखा है. इसी कड़ी में आज आपको चमकौर के युद्ध के बारे में बताते हैं जिसने वीरता की नई परिभाषा गढ़ी. इस युद्ध में 40 सिखो ने 10 लाख मुगल सैनिकों को धूल चटा दी थी.

17वीं शताब्दी की शुरुआत में पंजाब के चमकौर में गुरु गोविंद सिंह और वजीर खान की अगुवाई ये युद्ध लड़ा गया था. इस युद्ध में मुगलों की विशाल सेना का सामना 40 सिखों की मामूली फौज ने किया था. गुरु गोविंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन जफरनामा में किया है. उन्होंने बताया था कि जो वह सरसा नदी को पार करके चमकौर पहुंचे थे तो उन पर किस तरह हमला किया था. इस युद्ध में सिखों के 10वें गुरु गोविंद सिंह के दो बेटे साहिबजादा अतीत सिंह और साहिबजादा जुझार सिंह शहीद हो गए थे.

Battle of Chamkaur: घटनाक्रम

17वीं शताब्दी में आनंदपुर की आखिरी लड़ाई में कई मुगल शासकों की साझा फौज ने 6 महीने तक घेरे रखा. मुगल शासकों की सोच थी कि आनंदपुर साहिब में जब राशन पानी खत्म हो जाएगा तो वह खुद ब खुद हथियार डाल देंगे, लेकिन बहादुर सिखो ने मुगलों की इस सोच को गलत साबित कर दिया. आनंदपुर साहिब में राशन-पानी खत्म हुआ तो एक रात गुरु गोविंद सिंह अपने दल-बल के साथ रवाना हो गए. लेकिन मुगलों को इसकी भनक लग गई और उन्होंने इसका पीछा करना शुरू कर दिया. मुगलों को पीछा करते देख गोविंद सिंह सिरसा नदी की ओर बढ़ने लगे, लेकिन प्रकृति को शायद कुछ और ही मंजूर था.

सिखों का काफिला जब नदी के किनारे पहुंचा तो वहां बाढ़ विकराल रुप ले चुकी थी. पानी अपने उफान पर था. सामने नदीं की लहरे फुंफकार रहीं थी तो पीछे से दुश्मनों की फौज हमला करने के लिए तैयार थी. ऐसे में गुरु गोविंद ने निर्णय लिया कि कुछ सैनिक यहां रुक कर दुश्मनों से लोहा लेंगे और बाकि के कुछ सैनिक नदी के बहाव को पार करने की कोशिश करेंगे.

गुरु गोविंद के आदेश के बाद उदय सिंह और जीवन सिंह अपने दल के साथ शत्रुओं के साथ भिड़ गए, वहीं दूसरी तरफ गुरु गोविंद सिंह अपने दल के साथ सिरसा नदी को पार करने उतर गए. लेकिन नदी की लहरों का वेग इतना तेज था कि पार करने का फैसला गलत साबित हो गया. ठिठुरती ठंड में आसमान से बरसती बारिश और पैरों के बर्फीले पानी ने कई सैनिकों का हौसला पस्त कर दिया. सैकड़ों सैनिक पानी के वेग में बह गए. गुरु साहब की सेना का यह हाल देख दुश्मन कांप उठा और उसने नदी पार नहीं करने का फैसला किया.

इधर गुरु गोविंद सिंह ने अपने सैनिकों के साथ नदी पार करने के बाद गिनती की, तो वह सिर्फ 43 व्यक्ति ही थे. नदी की दूसरी तरफ उदय सिंह और जीवन सिंह की अगुवाई में अभी भी कुछ सिख सैनिक मुगलों को पछाड़ रह थे. अपने सैनिकों पर अनेकों हमले और परिवार के बिछड़ने की वजह से गुरु गोविंद सिंह टूट गए थे लेकिन उन्होंने अपने दल के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया. परिवार के बचे हुए सदस्यों को उन्होंने अन्य सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का फैसला लिया और कुल 40 सैनिकों के साथ आगे बढ़ गए. Battle of Chamkaur

अगली दोपहर तक गुरु गोविंद सिंह चमकौर के बगीचे तक पहुंच चुके थे. चमकौर के लोगों को जब गुरु गोविंद सिंह और उनके वीर सिखों के आने की बात पता चली तो उन्होंने उनका जोरदार स्वागत किया. गांव वालों के आग्रह पर चमकौर की एक हवेली में गुरु गोविंद सिंह रुक गए. उन्हें आभास था कि दुश्मन कभी भी हमला कर सकता है इसलिए सभी सैनिकों को असलहे देकर टुकड़ियों में बांट दिया और अलग-अलग मोर्चों पर तैनात कर दिया. जैसा कि खालसा का सिद्धांत है, दुश्मन के सामने हथियार नहीं डालने है, इस सिद्धांत का पालन करते हुए सभी सैनिकों ने वीरगति को प्राप्त करने का मन बना लिया था.

दूसरी तरफ सिरसा नदी में पानी का वेग जैसे ही कम हुआ, मुगलों की सेना ने धावा बोल दिया. वह पीछा करते हुए चमकौर पहुंचे तो उन्होंने पता चला कि गुरु गोविंद सिंह सिर्फ 40 सैनिकों के साथ कच्ची गढ़ी में ठहरे हुए हैं. मुगलों ने सिख सैनिकों की संख्या को कम आंककर यह मुनादी करा दी अगर गुरु गोविंद सिंह और उनके दूसरे सैनिक आत्म समर्पण कर देंगे तो उन्हें माफ कर दिया जाएगा. वाजिर खान की सेना की तरफ से यह संदेश गुरु गोविंद तक भी पहुंचाया गया लेकिन इसके जवाब में गुरुदेव के दल ने मुगलों पर तीरों की बौछार कर दी.

साल 1704 में दुनिया का यह अनोखा युद्ध शुरू हुआ. हल्की बूंदा-बांदी और भयंकर शीत लहरी के बीच मुगलों ने कच्ची गढ़ी पर हमला कर दिया. लेकिन सिखों के तीरों की बौछार ने मुगलों को एक कदम पीछे कर दिया. मुगल सैनिकों ने जब दोबारा कोशिश की तो इस बार उनका और भी बुरा हाल हुआ. कुछ ही पलों के अंदर मुगलों के सैकड़ों सैनिक चित्त हो गए. वीर सिखों के पास जब तक बाण और गोला बारुद था उन्होंने मुगलों की सेना को एक इंच भी आगे आने नहीं दिया. गोला बारुद खत्म होने के बाद वीर सपूतों ने तय किया कि अब तलवार और भालों से मुगलों को धूल चटाई जाएगी. Battle of Chamkaur

गुरुदेव ने रणनीति बनाई कि वह पांच सिखों का जत्था बनाकर मुगलों से मुकाबला करने के बाहर भेजेंगे और खुद गढ़ी की अटारी दुश्मनों पर हमला करेंगे. सिखों का एक जत्था किले से बाहर आता तो सैकड़ों सैनिकों की लाश बिछ जाती. लेकिन संसाधनों की कमी के चलते धीरे-धीरे जत्थे रणक्षेत्र में जाने लगे. इधर मुगल, सिखों का यह हौसला देखकर हैरान रह गए. आखिर में जब मुगलों को यह पता चला कि किले में सिर्फ गुरु गोविंद सिंह और उनके पास कुछ सैनिक ही बचे हैं तो सभी सेनापतियों ने तय किया वह एक साथ धावा बोंलेगे.

मुगलों की इस रणनीति को देखने के बाद गुरु गोविंद सिंह के शिष्यों ने उनसे निवेदन किया कि वह रणक्षेत्र छोड़कर किसी सुरक्षित स्थल पर के लिए निकल जाएं. लेकिन उन्होंने इस इनकार करते हुए आखिरी जत्थे के रूप में अपने पुत्र अजीत सिंह को चार सैनिकों के साथ भेजा, अजित सिंह युद्ध कला में निपुण थे. वो मुगलों पर इस तरह टूटे, जैसे मानों कोई भूखा शेर अपने शिकार पर टूटता है. 5 सिखों का जत्था रणक्षेत्र के जिस हिस्से में जाता वहां मुगलों की लाशे बिछ जाती. आखिर में मुगलों की विशाल सेना ने अजित सिंह को शहीद कर दिया. इसके बाद गुरु गोविंद सिंह के छोटे पुत्र जिघार सिंह रणक्षेत्र में कूदे. अपने बड़े भाई की तरफ जिघार सिंह भी मुगलों पर काल बनकर टूटे.

इन सबके बीच पूरा दिन बीत गया, अंधेरा होने के बाद युद्ध रुक गया. गढ़ी के अंदर गुरु गोविंद सिंह को लेकर कुल 8 लोग बचे. शिष्यों ने गुरु से निवेदन किया कि वह गढ़ी छोड़कर चले जाएं लेकिन गुरु गोविंद सिंह ने किसी की एक न सुनी. आखिर में पांच सिखो ने पंच परमेश्वर का नाम लेकर गुरु गोविंद सिंह से निकल जाने का वादा करा लिया. गुरु गोविंद सिंह के भाई जीवन सिंह की डील डौल गुरुदेव की तरह थी. गुरु गोविंद सिंह अपने दो सिख साथियों के साथ गढ़ी के एक हिस्से में छिप गए. दूसरी तरफ जीवन सिंह ने गुरु देव की वेशभूषा पहन बाहर निकले और मुगलों को ललकारते हुए दूसरी दिशा में भागे. मुगलों की एक बड़ी टुकड़ी अपने शासक के आदेश पर उनके पीछे भाग पड़ी.

अगले दिन जब सवेरा हुआ तो मुगलों को पता चला कि हजारों मुगल सैनिकों के बदले सिर्फ 35 सिख ही मरे हैं, और उनमें भी गुरु गोविंद का शव कहीं नहीं मिला. मुगलों के मुंह पर तमाचा था, इसके बाद बौखलाए शासकों ने एक साथ गढ़ी पर हमला कर दिया. अंदर बचे 5 सिखों ने मुगलों को मुंह तोड़ जवाब दिया लेकिन एक स्तर पर आने के बाद वो भी वीरगति को प्राप्त हो गए. इस युद्ध में मुगलों ने अपने हजारों सैनिक खो दिए, खजाने की लाखों अशरफियां बर्बाद कर दी, लेकिन उनके हाथ न तो गुरु गोविंद सिंह लगे और न ही सिखों की अपनी स्वाधीनता स्वीकार करवा पाए. Battle of Chamkaur

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