buta singh
Buta Singh (फाइल फोटो)

Buta Singh: इंदिरा गांधी (Indira Gandhi), राजीव गांधी (Rajeev Gandhi) और सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की अगुवाई में कांग्रेस संगठन और सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके बूटा सिंह (Buta Singh) का शनिवार को निधन हो गया. वह 86 वर्ष के थे. पार्टी के लिए ‘हाथ का पंजा’ चुनाव चिन्ह चुनने में अहम भूमिका निभाने वाले कांग्रेस के कद्दावर नेता ने एम्स में अंतिम सांस ली. वह (Buta Singh) लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे, पिछले साल ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्हें दिल्ली AIIMS में भर्ती किया गया था और वह पिछले साल अक्टूबर महीने से कोमा में ही थे.

Buta Singh: नीतीश कुमार के लिए पहले बने ‘अभिशाप’ फिर बने ‘वरदान’

बूटा सिंह (Buta Singh) ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में केंद्रीय गृह मंत्री, रेल मंत्री, कृषि मंत्री समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. इसके अलावा वह बिहार के राज्यपाल और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष भी रहे. वह आठ बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए.

राजनीतिक करियर में लंबे समय तक कई ऊंचाइयों को छूने वाले बूटा सिंह को 2005 में बिहार के राज्यपाल के तौर पर विधानसभा भंग करने की अनुशंसा से जुड़े फैसले के कारण खासे विवाद का सामना करना पड़ा था. फरवरी, 2005 में हुए चुनावों में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, नीतीश कुमार की अगुवाई में उस वक्त NDA ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन बूटा सिंह ने राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी. इसके छह महीने बाद हुए चुनाव में नीतीश कुमार के अगुवाई में NDA को बहुमत मिला. तमाम उठापटक और फेरबदल के बाद नीतीश कुमार आज बिहार की सत्ता के शिखर पर बने हुए हैं.

Buta Singh: राजीव सरकार में रहे ‘नंबर दो’

बूटा सिंह साल 1962 में पहली बार लोकसभा पहुंचे. उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ काम को किया ही, साथ ही वह सोनिया गांधी की अगुवाई में संगठन और बाद में UPA सरकार के दौरान संवैधानिक पदों पर काम किया. सिंह 1960, 1970 और 1980 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे. अपने स्वभाव के कारण वह राजीव गांधी के भी बेहद करीबी रहे और इसके बाद बूटा सिंह के रिश्ते नरसिंह राव से भी अच्छे रहे.

Buta Singh: चुना कांग्रेस का पंजा

कांग्रेस में बूटा सिंह (Buta Singh) के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1978 में जब इंदिरा ने कांग्रेस (I) बनाई तो नए चुनाव चिन्ह को चुनने के लिए उन्होंने बूटा सिंह को जिम्मेदारी दी. सिंह के अलावा इस काम का जिम्मा नरसिंह राव पर भी दिया गया.सीनियर जर्नलिस्ट रशीद किदवई की किताब ‘बैलट: टेन एपिसोड्स दैट हैव शेप्ड इंडियाज डेमोक्रेसी में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है. किताब के अनुसाब, चुनाव आयोग ने उस वक्त कांग्रेस (I) को तीन चुनाव चिन्हों- हाथी, हाथ का पंजा और साइकिल में से किसी एक चुनने का विकल्प दिया गया. इंदिरा गांधी ने इस काम के लिए बूटा सिंह को टेलीफोन किया, शुरू में इंदिरा गांधी को लगा कि वह ‘हाथी’ चुनाव चिह्न को चुनने के लिए कह रहे हैं, लेकिन बाद में उन्हें साफ हुआ कि सिंह का हाथ का ‘पंजा’ पसंद है. इसके हाथ के ‘पंजे’ का चयन हुआ और आज तक यह कांग्रेस का चुनाव निशान है.

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