China–United States Trade War

China–United States Trade War : अमेरिका ने चीनी आयातों पर 200 बिलियन डॉलर के टैरिफ लगाए हैं. इससे पहले भी अमेरिका, चीन पर दो बार टैरिफ लगा चुका है. हालांकि चीन और अमेरिका ने अपने व्यापारिक घाटों को संतुलित करने हेतु एक समझौता किया था ,पर अमेरिकी सरकार ने चीन पर समझौते का पालन ना करने का आरोप लगाते हुए यह कदम उठाया है. अमेरिकी सरकार के मुताबिक यह प्रतिबन्ध चीन से हो रहे व्यापारिक घाटे को कम करने के लिए लगाया जा रहा है. वर्तमान में अमेरिका 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ विश्व कि सबसे शक्तिशाली आर्थिक शक्ति है. परन्तु अनेक विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि 2027 तक चीन विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन सकता है,और यह ही अमेरिका के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय बन चुका है. अमेरिका ने चीन को यह आदेश दिया है कि वह होस्टन शहर में स्थित चीनी वाणिज्यिक दूतावासों को यथा शीघ्र खाली कर दे. अमेरिका के इस आदेश से बौखलाए चीन ने भी जवाब में अमेरिका को यह आदेश दिया है कि वह चेंगडू शहर में स्थित अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास को बन्द कर दे./China–United States Trade War

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अमेरिकी प्रमुख राज्य सचिव माइक पॉम्पियो का ताजा बयान जिसके अनुसार ,अमेरिका के इन क़दमों के उठाने की प्रमुख वजह है,”चीन द्वारा बौद्धिक सम्पदा की चोरी”अमेरिका ही नहीं अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने भी यह आरोप लगाया है कि चीन वैश्विक व्यापार के नियमो का दोहन कर रहा है. वह अपना माल तो खूब निर्यात कर रहा है पर अन्य राष्ट्रों के चीन में व्यापार करने पर अनेक गैर कानूनी नियमो के द्वारा बाधा उत्पन्न कर रहा है./China–United States Trade War

चीन अमेरिका विवाद से अन्य दक्षिण एशियाई राष्ट्रों का लाभ/ China–United States Trade War

वैश्विक व्यापार युद्ध के इस घटना ने बड़े बड़े कंपनियों को चीन से यथा शीघ्र अपने ओद्यौगिक इकाइयों को हटा कर कहीं और शिफ्ट करने के लिए बाध्य कर दिया है. इसके फलस्वरूप एक तरफ जहां चीन को इससे बहुत ज्यादा हानि होने का आसार है तो वहीं दूसरी तरफ अन्य दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह एक सुनहरे अवसर के रूप में बनकर उभरा है. वर्ल्ड बैंक के Ease of doing Business index जो यह बतलाता है कि व्यापार करने हेतु कौन सा देश सबसे सुगम और सुलभ है,उसके अनुसार दक्षिण एशियाई देश इस लिस्ट में सबसे ऊपर स्थान रखते हैं.

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सस्ते मजदूरी,आसान नियम कानून और सरकारी सहयोग के कारण कंपनियों को इन देशों में उद्योग इकाइयों को लगाना अपेक्षाकृत ज्यादा आसान और लाभकारी होता है. इस लिस्ट में मलेशिया (15), थाईलैण्ड (27),वियतनाम (69),इंडोनेशिया(73) और भारत (77) वें स्थान पर है.

चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध और भारत/ China–United States Trade War

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China–United States Trade War: अमेरिका और चाइना के मध्य करीब दो सालों से चल रहे इस व्यापार युद्ध का असर अब अंतरराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादन और व्यापार पर पड़ रहा है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने उत्पादन इकाइयों को चीन से बाहर लगा रही हैं,और इसका सीधा लाभ भारत जैसे देशों को मिल रहा है. हाल ही में एप्पल फोन की निर्माता फॉक्सकॉन ने चेन्नई में अपनी उत्पादन इकाई लगाई है,और अब वहां से आईफोन 11 का उत्पादन और विश्व के बाजारों में निर्यात भी प्रारंभ हो चुका है. परन्तु भारत अभी भी व्यापार सुलभ राष्ट्रों की सूची में अपने प्रतिस्पर्धी अन्य दक्षिण एशियाई राष्ट्रों से काफी नीचे है,और इस वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अभी भी भारत उनके प्रिफरेंस लिस्ट में नहीं है.

इसके पीछे मूलतः दो बड़े कारण हैं –

1- जटिल भूमि अधिग्रहण कानून
2- लेबर लॉ

भारत में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को भूमि अधिग्रहण करने में बहुत ही जटिल कानूनी दावपेंच से गुजरना पड़ता है,कई बार तो इसमें सालों लग जाते हैं. कंपनियां कोर्ट कार्यवाहियों में फंसने से भी बचना चाहती हैं. भारत में लेबर कानून अत्यन्त जटिल है. तकरीबन 40 से ज्यादा एक्ट लेबर कानूनों में हैं।इनके कारण कंपनियां भारत में अपनी इकाइयां लगाने में संकोच करती हैं क्यों कि इनके वजह से उनको अनेक प्रकार की दिक्कतों को झेलना पड़ता है तथा यह आर्थिक रूप से भी उनके लिए लाभप्रद सिद्ध नहीं होता.
परन्तु भारत सरकार ने वर्तमान परिस्थितियों में अधिकाधिक कंपनियों को भारत की तरफ मोड़ने के लिए अनेक कदम उठाए हैं. भारत को जिन क्षेत्रों में लाभ हो सकता है वो मुख्यत: – फार्मा, केमिकल्स, इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्र हैं. विश्व की प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों को भारत में अपने उत्पादन इकाइयों को खोलने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु भारत सरकार की तरफ से अनेक कार्यक्रम शुरू किए गए हैं,जिनमें से कुछ निम्न हैं-

1-PLI (production linked incentive scheme)

2-SPECS (Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors)

3-EMC 2.0 ( Modified Electronic Manufacturing Clusters)

इन प्रोत्साहन योजनाओं के पीछे सरकार की यह मंशा है की अंतरराष्ट्रीय स्मार्ट फोन बाजार में “भारत में निर्मित” उत्पाद पहुंचें।और सरकार अपनी इस मंशा में काफी हद तक सफल भी नजर आ रही है क्यों कि सैमसंग,फॉक्सकॉन,विस्ट्रॉन्न, पेगेट्रॉन्न , राइजिंग स्टार जैसी अंतरराष्ट्रीय स्मार्ट फोन निर्माता कंपनियों ने भारत में अपने उत्पादन इकाइयों को लगाने का करार किया है।इनमें फॉक्सकॉन, पेगट्रॉन्न और विस्ट्रोन्न एप्पल आईफोन के कॉन्ट्रैक्ट निर्माता हैं। एप्पल और सैमसंग वैश्विक स्मार्टफोन बाजार का 60% हिस्सेदारी रखते हैं.

इसके अतिरिक्त भारतीय कंपनियों जैसे लावा,माइक्रोमैक्स, डेक्सन ने भी भारत में अपने उत्पादन इकाइयों को लगाने का निर्णय लिया है. भारत सरकार में इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय के प्रमुख मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपने हालिया बयान में कहा कि,विभिन्न योजनाओं के तहत कंपनियों द्वारा भेजे गए प्रोपोजल में करीब 11.5 लाख करोड़ के उत्पादन का प्रस्ताव है. इसके फलस्वरूप भारत में 12 लाख नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे जिनमें से 3 लाख नौकरियां प्रत्यक्ष रूप से तथा बाकी अप्रत्यक्ष रूप से होंगी.

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  1. जानकारी देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।।

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