hagia sophia

Hagia Sophia जिसका हिंदी उच्चारण ‘हाया सोफिया‘ है, तुर्की में स्थित एक ऐसा विवादित स्थल है जो हाल फिलहाल तक म्यूजियम था, जिसे तुर्की सरकार द्वारा मस्जिद में बदलने का फैसला किया गया है, और जो किसी जमाने में बाइजेंटाइन साम्राज्य की एक चर्च हुआ करती थी, Hagia Sophia का निर्माण 567 AD में हुआ था, यह आधुनिक ग्रीस के आसपास फैले बाइजेंटाइन साम्राज्य की सबसे खूबसूरत इमारतों में एक है, इसके इतिहास को समझे बिना हम तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान की महत्वकांक्षा और इस स्थल को लेकर ईसाई मुस्लिम जगत में टकराव का कारण नहीं जान पाएंगे.

ईसाई-मुस्लिम संघर्ष का इतिहासच/ Hagia Sophia

तुर्की में एक साम्राज्य था, उस्मानी या ऑटोमन साम्राज्य हैं, इसका एक राजा था Mehmed द्वितीय, जिसने 21 वर्ष की आयु में ईसाइयों के बाइजेंटाइन साम्राज्य को नष्ट करके उसकी राजधानी कुस्तुन्तुनिया और वहां की सबसे खूबसूरत चर्च Hagia Sophia पर अधिकार कर लिया. Mehmed ने चर्च में ईसा मसीह से जुड़े सभी चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया और उनपर इस्लामिक चिन्ह बनवा दिए.

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1918, प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की अमेरिका-ब्रिटेन और अन्य मित्र राष्ट्रों के हाथों पराजय के बाद ऑटोमन साम्राज्य का पतन हो गया, कमाल पाशा के नेतृत्व में नए लोकतांत्रिक, आधुनिक और पंतनिरपेक्ष तुर्की की स्थापना हुई. कमालपाशा के सामने जब हाया सोफिया की समस्या आयी तो उसने इसे चर्च या मस्जिद के बजाए म्यूजियम में बदल दिया. कई सालों बाद अब जाकर तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगान के शासन में तुर्की की हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि इसे पुनः मस्जिद में बदल दिया जाए. बाइजेंटाइन और ऑटोमन साम्राज्यों का झगड़ा इस्लाम और ईसाइयत के सैकड़ों सालों तक हुए ऐतिहासिक धर्मयुद्ध का एक भाग था. इस हाया सोफिया को दुबारा मस्जिद में बदलकर एर्दोगान ने 1453 में ईसाइयों को मिली ऐतिहासिक पराजय की याद ताजा कर दी है.

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एर्दोगान की महत्वकांक्षा क्या है? / Hagia Sophia

इस सवाल का जवाब छुपा है हाल में आई एक Web Series Diriliş: Ertuğrul में, इसका प्रसारण हुआ था तुर्की के सरकारी चैनल पर, इसे दुनिया में मुसलमानों द्वारा पसंद किया गया. संभावना है कि इसे एर्दोगान सरकार ने ही फण्ड भी किया था. इसकी कहानी ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना से जुड़ी है, यद्यपि इतिहास की दृष्टि से यह Web Series तथ्यपरक नहीं है मतलब इसका वास्तविक इतिहास की घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है, फिर भी यह मुसलमानों के उस गौरवशाली दौर की कहानी बताती है जब उन्होंने दुनिया की महानतम शक्तियों पर विजय पाई थी. साथ ही यह तुर्की के उस महान दौर की याद दिलाती है जब तुर्की के शासक को खलीफा कहा जाता था, जो सारे मुस्लिम जगत का एकमात्र आध्यात्मिक नेता था, जिसके वर्चस्व को दुनिया में हर मुसलमान मानता था.

एक ऐसे मुस्लिम जगत को, जिसके पास वर्तमान में गर्व करने के लिए कोई विशेष उपलब्धि नहीं है, एर्दोगान इतिहास की याद दिलाकर एकजुट करना चाहते हैं, साथ ही वो यह भी चाहते हैं कि दुनिया का मुसलमान तुर्की के शासक को दुबारा उतनी ही श्रद्धा से देखे, जैसे खलीफा के समय हुआ करता था. एर्दोगान अपनी खिलाफत स्थापित करना चाहते हैं, स्वयं को खलीफा बनाना चाहते हैं. यही कारण था कि मिस्र, सऊदी अरब और UAE जैसी अन्य प्रमुख शक्तियों ने इस सीरीज को प्रतिबंधित कर दिया था, ये सभी देश एर्दोगान के वर्चस्व को बढ़ने से रोकना चाहते हैं.

मुस्लिमों के सर्वमान्य नेता की छवि बनाने की कोशिका / Hagia Sophia

अपनी महत्वाकांक्षा के कारण ही एर्दोगान लगातार कश्मीर मुद्दे पर भारत को घेर रहे थे, जिससे वो ये साबित कर पाएं की वो सारे मुस्लिम जगत के प्रवक्ता हैं. इसी तरह उन्होंने फिलिस्तीन के मुसलमानों के मुद्दे को भी जोरदार तरीके से उठाया. यही कारण है कि भारतीय उपमहाद्वीप में भी एर्दोगान की लोकप्रियता बड़ी तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि इस क्षेत्र का मुसलमानों का एक बड़ा तबका एर्दोगान के रूप में अपने ऐसे वैश्विक नेतृत्व को देखता, जो अतीत के वर्चस्व को पुनः स्थापित कर सके.

तुर्की में खिलाफत की पुनर्स्थापना का प्रयास

Hagia Sophia के मस्जिद में परिवर्तन से एर्दोगान ने यह और स्पष्ट कर दिया है कि तुर्की अब दुबारा खिलाफत के रास्ते पर है, और कमालपाशा का सेक्युलर तुर्की कट्टरपंथी इस्लाम की ओर बढ़ रहा है. तुर्की ने फैसला किया है कि कुरान की 48वीं सूरह, सूरह अल फ़तह इस मस्जिद में पढ़ी जाएगी. इस सूरह के पढ़े जाने के भी अपने मायने है, इसमें ऐसे मुसलमानों की आलोचना की गई है जो इस्लाम की सीख पर पूर्ण विश्वास प्रकट नहीं करते, इन्हें मुशरिक कहा जाता है.

आधुनिक अर्थों में एक सेक्युलर और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्षधर व्यक्ति इस परिभाषा में आ सकता है. इस्लामिल मान्यताओं के अनुसार यह सूरः जंग ए खैबर की पृष्ठभूमि में पैगम्बर मुहम्मद पर अल्लाह द्वारा उतारी गई थी, जिसमें वो ऐसे सभी मुशरिक मुसलमानों को डराते हैं जो पिछले संघर्षों में उनके साथ नहीं थे, और उनसे जंग ए खैबर के लिए साथ रहने का वादा लेते हैं. जंग ए खैबर मुसलमानों और यहूदियों के बीच हुई थी.

साफ जाहिर है कि इशारों इशारों में एर्दोगान तुर्की के मुसलमानों को आधुनिक विचारों से हटाकर पुनः कट्टरपंथी इस्लाम की ओर झुकाना चाह रहे हैं. यही नहीं उनका इरादा तुर्की में पहले से ही मौजूद यहूदी विरोधी भावनाओं को भड़काना है. हाया सोफिया के अधिग्रहण और सूरः अल फ़तह की नमाज दोनों बताती हैं कि उनका उद्देश्य मुसलमानों में पारंपरिक रूप से मौजूद ईसाई-यहूदी विरोधी भावना भड़काकर तुर्की को अधिकाधिक कट्टरपंथी इस्लाम की ओर धकेलना है जिससे वो तुर्की में स्वयं को खलीफा की तरह स्थापित कर सकें साथ ही दुनियाभर के मुसलमानों के नेता बन सकें.

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