India US Relation

India US Relation: जब से जिनपिंग ने सत्ता संभाली है तब से दुनिया ने एक अधिक आक्रामक चीन को देखा है. जिनपिंग ने पारम्परिक विदेश निति में बदलाव करते हुए चीन को वैश्विक पटल पर अधिक सक्रिय कर दिया है. इसको हम चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट से समझ सकते है. चीन का यही कार्यक्रम यही अमेरिका के आज सबसे गंभीर चुनौती बन गया है.

चीन का बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट/ India US Relation

चीन ने 2013 में बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का विचार दुनिया के सामने रखा. इस प्रोजेक्ट में चीन दुनिया के 70 देशों में करीब 1 ट्रिलियन US डॉलर्स का निवेश करेगा. यह निवेश यातायात सुधारने के उद्देश्य से होगा जिससे इन देशों का व्यापार आपस में तथा चीन के साथ और तेजी से बढ़े. चीन का उद्देश्य यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका में अपने व्यापार को और फैलाना है.

चीन यह जानता है की अमेरिका की शक्ति उसकी मजबूत नौ सेना है इसलिए चीन ने अमेरिकी नौसैनिक वर्चस्व से बचने के लिए भूमि से ही अधिकांश व्यापार फ़ैलाने के लिए कार्य शुरू किया है. चीन ने पारम्परिक सिल्क रुट, जिसके द्वारा भारत सहित पूर्वी एशिया के व्यापारी पश्चिम एशिया तथा यूरोप से व्यापार करते थे, को ही दुबारा इस्तेमाल करने की योजना पर काम शुरू किया है. इस कार्यक्रम की सफलता का अनुमान आप इससे ही लगा सकते हैं की अमेरिकी सैन्य गठबंधन के गिने चुने प्रमुख देशों के अतिरिक्त सभी साथी इस योजना में चीन के साथ हैं , यूरोपीय संघ के भी अधिकांश देश इसका हिस्सा हैं। वास्तव में पश्चिमी यूरोप के जर्मनी, फ्रांस, निदरलैंड जैसे अधिक संवृद्ध देशों के अतिरिक्त सारा यूरोप चीन के आर्थिक गठबंधन के साथ रहना चाहता है. पश्चिमी यूरोप में भी इटली ने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए हैं और जर्मनी जैसे प्रमुख देश में लगातार माहौल चीन के समर्थन में बनता जा रहा है.

अमेरिका धीरे धीरे हो रहा है अलग/ India US Relation

अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ लगातार वैश्विक युद्ध किये, ऐसे कभी न खत्म होने वाले युद्धों को के कारण लोगों में असंतोष बढ़ रहा था. अमेरिका में अपनी विदेश निति को लेकर नाराज़गी थी. यही कारण था की ट्रम्प ने 2016 में अपने चुनाव में लोगों से वादा किया की वो अमेरिका को ऐसे युद्धों से निकालेंगे. जब अमेरिका ने खुद को वैश्विक मंच से दूर किया तो अमेरिका के दुराव के कारण आयी रिक्तता का फायदा चीन को मिलने लगा. अमेरिका ने पश्चिम एशिया में जो युद्ध लड़े उसके कारण मुस्लिम जनमानस में उनकी छवि धूमिल हुई. इस कारण मुस्लिम देशों में अब चीन के प्रति दोस्ताना रवैया बढ़ रहा है.

साथ ही पश्चिम एशिया की राजनितिक अस्थिरता ने यूरोप के देशों को ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से मित्रता बढ़ाने पर मजबूर किया है, इसने स्वाभाविक रूप से यूरोप, विशेष रूप से वहां की सबसे बड़ी शक्ति जर्मनी, के साथ अमेरिका के रिश्ते ख़राब किये हैं. इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ अमेरिका के व्यापारिक टकराव ने भी यूरोप को धीरे धीरे अमेरिका से दूर करना शुरू कर दिया है. इस दुराव का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है की अमेरिका और ब्रिटेन के बार बार सावधान करने के बाद भी अब तक जर्मनी ने हुवावे के साथ 5G करार रद्द नहीं किया है. यूरोप और एशिया के लगभग सभी देशों , जिनमें दक्षिण एशिया के भारत के पड़ोसी मुल्क भी शामिल हैं, चीन के प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं. अफ्रीका में भी चीन व्यापक रूप से निवेश करा रहा है। चीन का उद्देश्य अपने आर्थिक प्रभुत्व द्वारा दुनिया में अमेरिका के प्रभाव को खत्म करना है.

इसलिए है भारत महत्वपूर्ण/ India US Relation

चीन ने दुनिया के जिस नक़्शे को गढ़ना शुरू किया है उसमें उसके लिए भारत महत्वपूर्ण है. क्योंकि जिस पारम्परिक सिल्क रुट को चीन ने BRI का आधार बनाया है उसमें लद्दाख और गिलगिट बाल्टिस्तान एक महत्वूर्ण लिंक है, इस रास्ते से व्यापार अधिक किफायती है. दूसरा भारत के द्वारा सड़क मार्ग से ही पूर्वी एशिया के देशों को पश्चिम एशिया और यूरोप के साथ जोड़ा जा सकता है. अन्य दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण यह हैं की भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और एक उभरती आर्थिक महाशक्ति, ऐसे में दुनिया के आर्थिक विकास का कोई भी प्रोजेक्ट बिना भारत के अधूरा ही है. अंतिम कारण है हिन्द महासागर में भारत का एकछत्र राज। इस क्षेत्र सबसे मजबूत नौसेना भारत की है और चीन यदि अमेरिका के वर्चस्व को समाप्त करना चाहता है तो हिन्द महासागर को ही दुनिया में व्यापार का केंद्र बनाना होगा.

यही कारण था की चीन, भारत को अमेरिकी धड़े में जाने से रोकने की कोशिश कर रहा है, और इसके लिए भारत पर सैन्य दबाव बनाने के असफल प्रयास कर रहा है। वहीं अमेरिका की कोशिश यही है की किसी प्रकार भारत को चीन के विकल्प के रूप में विकसित किया जाए.

भारत और अमेरिका के विकल्प/ India US Relation

अब भारत के पास दो रास्ते हैं. पहला की चीन के साथ अपने सीमा विवाद को सुलझाकर इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बने, चीन के वर्चस्व के अधीन रहकर शांतिपूर्ण आर्थिक विकास करे। इसके फायदे ये हैं की भारत की एक सीमा शांत हो जाएगी और चीन से शस्त्रों की होड़ भी काफी हद तक ख़त्म हो जाएगी, जिसके बाद भारत अपने विकास पर और बेहतर ध्यान दे पाएगा। साथ ही भारत को चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का हिस्सा बनकर एक बड़ा बाजार भी उपलब्ध होने की संभावना है.

दूसरा रास्ता अमेरिका का साथ देकर स्वयं को चीन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना है. मोदी सरकार की नीतियां बताती हैं की वर्तमान सरकार ने दूसरा रास्ता ही चुना है. लेकिन एक बात तय है भारत जिस भी रास्ते को चुने, अमेरिका के लिए निश्चित रूप से विकल्प सिमित हैं, जिसमें भारत को चीन का विकल्प बनाना सबसे बेहतर है.भारत को अमेरिका की जितनी जरुरत है, उससे अधिक जरूरत अमेरिका को भारत की है.

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