PM Modi in EU India Summit

15 जुलाई को भारत हुए यूरोपीय यूनियन के बीच 15th EU-India समिट में भारत भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार भारत और EU को “नेचुरल पार्टनर” कहा और दोनों पक्षों के लोकतंत्र होने की बात को दृढ़ता के साथ दोहराया है लेकिन EU का वर्तमान स्वभाव यह बताता है की निकट भविष्य में भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों में वैसी सरगर्मी नहीं दिखेगी जैसा भारत और अमेरिका के रिश्तों में देखने को मिलती है. कारण यह है की यूरोप चीन के विरुद्ध वैसे आक्रामक नहीं है जैसा ब्रिटेन या अमेरिका हैं.

अमेरिका और यूरोप : इतिहास और वर्तमान/ EU

Covid-19 के बाद की दुनिया उससे काफी अलग होगी जैसे वह कोरोना वायरस के फैलाव से पूर्व थी. नए वैश्विक समीकरणों में एक बात जो स्पष्ट है. वह ये है की अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंदिता दुनिया का वैसा ही ध्रुवीकरण कर सकती है जैसा शीतयुद्ध के जमाने हुआ करता था. शीत युद्ध में एक ओर अमेरिका के समर्थक देश थे और एक सोवियत रूस के समर्थक देश थे. तब यूरोप भी दो धड़े में बंटा था और सोवियत रूस की विनाशकारी सैन्य शक्ति और उसकी कम्युनिस्ट विचारधारा के फैलाव के डर ने पश्चिमी यूरोप के देशों को अमेरिका का पिछलग्गू बना दिया था. जब सोवियत रूस टूट गया तो यूरोप पर से खतरे के बादल हट गए. इसी समय विश्व में एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में यूरोपीय संघ का जन्म हुआ. बाद में इसमें वे देश भी शामिल हो गए जो कभी ऐच्छिक या दबाव के कारण, सोवियत धड़े में बने हुए थे.

तब से अब तक दुनिया बहुत बदल गई है. रूस की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर है की वो अब यूरोप के लिए वैसा खतरा नहीं है. साथ ही यूरोप की ऊर्जा जरूरतों के कारण रूस, अब यूरोप में ही प्राकृतिक गैस और तेल का बाजार खोज रहा है. रूस से जर्मनी ने प्राकृतिक गैस के आयात के लिए समझौता कर लिया है, जबकि अमेरिका से ही अब यूरोप का आर्थिक मुद्दों पर टकराव हैं. दुनिया में शस्त्रीकरण इतना बढ़ गया है की इसके डर से ही अब सैन्य संघर्ष होने की संभावना न के बराबर है. जो थोड़े बहुत टकराव हैं तो वो भी एशिया और अफ्रीका में दिखते हैं जो यूरोप के लिए कोई सीधा खतरा नहीं हैं. इसलिए यूरोप किसी वैश्विक गुटबंदी की स्थिति को टालना ही चाहेगा.

यूरोप की चीन के प्रति निति के आर्थिक पहलू/ EU

चीन आज दुनिया की ग्लोबल सप्लाई चेन में सबसे अहम भूमिका निभाता है. आसान भाषा में समझे तो आज जो कुछ भी दुनिया में बन रहा है उसमें चीन की किसी न किसी प्रकार से भागीदारी है. इसका एक उदाहरण भारत का फार्मास्यूटिकल है. भारत आज दुनिया में दवाओं का प्रमुख निर्यातक है, लेकिन दवा बनाने के लिए जो मूलभूत अवयव API चाहिए वह भारत चीन से ही खरीदता रहा है. इसी तरह से चीन में बनने वाले किसी जूते का उदाहरण लें तो इसका उत्पादन चीन में हो रहा है लेकिन इसमें फैक्ट्री लगाने के लिए निवेश या धन यूरोप या अमेरिका से आया है, क्योंकि अमेरिका या यूरोप की अपेक्षा चीन में सस्ते में काम करने वाले श्रमिक मिल जाएंगे और चीन में सामान बनाकर एशिया में बेचना ज्यादा किफायती है बजाए यूरोप या अमेरिका में बनाकर बेचने के.

इसे कहते हैं ग्लोबल सप्लाई चेन , जिसमें सामान बनाता कोई और है लेकिन उसमें मिलने वाले अवयव अन्य देशों से आयात होते हैं, जबकि उसमें निवेश किसी और देश से आता है. चीन का इसी सप्लाई चेन पर काफी प्रभाव है, इतना की दुनिया का 30 प्रतिशत उत्पादन चीन में होता है. चीन को इस सप्लाई चेन से बाहर खदेड़ना कठिन काम है क्योंकि चीन में पहले से ही काफी बड़ी मात्रा में निवेश किया जा चुका है और इस पुरे निवेश को दांव पर लगाने और भारत में सब कुछ नए सिरे से शुरू करने का कोई ठोस कारण यूरोपीय संघ के पास नहीं है.

चीन के खिलाफ EU है मौन/ EU

यूरोपीय संघ, चीन की दक्षिणी चीन सागर में या भारत के विरुद्ध आक्रामकता को अपने लिए कोई सीधा खतरा नहीं मानता. हालांकि फ्रांस ने भारत का चीन के विरुद्ध खुलकर समर्थन किया था लेकिन यह यूरोपियन यूनियन के आधिकारिक स्टैंड को प्रभावित नहीं करता. लद्दाख में हुए टकराव पर बयान देते हुए यूरोपियन यूनियन ने बड़ा सधा हुआ रवैया अपनाया. संघ ने दोनों पक्षों से मामले के शांतिपूर्ण समाधान की अपील की, जबकि चीन की आक्रामकता के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं की. EU का यह रवैया तब है जब अमेरिका खुलकर भारत के साथ खड़ा था. यही नहीं हांगकांग में चीन द्वारा लागू किये गए नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के खिलाफ भी EU ने कोई मुखर विरोध नहीं किया है जबकि EU का पूर्व सदस्य ब्रिटेन इसके विरोध में लगातार आक्रामक है. EU के इस नरम व्यवहार में जर्मनी की भूमिका महत्वूर्ण है. जर्मनी के ही दबाव में EU कोई बड़ा निर्णय नहीं ले रहा है. फिर भी मेडिसिन, विज्ञान, क्लीन एनर्जी आदि क्षेत्रों में भारत और यूरोप परस्पर सहयोग करेंगे, मगर चीन के विरुद्ध यूरोप भारत का खुलकर साथ देगा इसकी उम्मीद कम है.

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