subramanian swamy

अपनी बेबाक राय और विवादित टिप्पणियों की वजह से अक्सर सुर्खियों में रहने वाले सुब्रमण्यम स्वामी (Subramanian Swamy) असाधारण क्षमताओं के धनी भी हैं. स्वामी प्रतिभाशाली गणितज्ञ और कानून के जानकार तो हैं हीं, साथ ही एक जाने माने राजनेता भी हैं. तो चलिए जानते हैं उनके बारे में.

Subramanian Swamy का जन्म और परिवार

सुब्रमण्यम स्वामी (Subramanian Swamy) का जन्म 15 सितंबर 1939 को चेन्नई में एक संपन्न परिवार में हुआ था. उनके पिता सीताराम सुब्रमण्यम, एक जाने-माने गणितज्ञ थे, वह भारत सरकार में सचिव थे और केंद्रीय सांख्यिकी इंस्टीट्‍यूट के डायरेक्टर परद भी तैनात रहे. सुब्रमण्यम स्वामी की माता केरल से थीं.

Subramanian Swamy की शिक्षा

सुब्रमण्यम स्वामी (Subramanian Swamy) अपने पिता की तरह तीक्ष्ण बुद्धी के थे और पिता की तरह ही वह गणितज्ञ भी बनना चाहते थे. इसलिए उन्होंने हिंदू कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री भी ली. इसके बाद वह कोलकाता गए भारतीय इंस्टीट्यूट में पढ़ाई के लिए, लेकिन यहां उनका विद्रोही रूप सामने आया.

Subramanian Swamy: विद्रोह का बिगुल

जिस वक्त सुब्रमण्यम स्वामी केंद्रीय सांख्यिकी इंस्टीट्‍यूट में पढ़ाई के लिए गए तो वहां पीसी महालानोबिस डायरेक्टर के पद पर आसीन थे. वह एक जमाने में स्वामी के पिता के प्रतिद्वंदी रहे थे. तेज दिमाग वाले स्वामी ने अपने खराब ग्रेड के लिए पीसी महालानोबिस को खुले तौर पर जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया. उन्होंने साल 1963 में एक शोध पत्र के जरिए बताया कि महालानोबिस की सांख्यिकी गणने के तरीके को पुराने तरीके पर आधारित बताया.

24 साल की उम्र में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री

सुब्रमण्यम स्वामी (Subramanian Swamy) ने महज 24 साल की उम्र में पीएचडी की डिग्री हासिल की थी. 27 साल की उम्र तक आते-आते हावर्ड में गणित भी पढ़ाने लगे थे. अपने तेज दिमाग के चलते स्वामी तेजी से लोकप्रिय होने लगे. साल 1968 में अमर्त्य सेन ने स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया. वह साल 1969 में भारत वापस आए और IIT दिल्ली में पढ़ाने लगे.

Subramanian Swamy: इंदिरा गांधी की नाराजगी का सामना किया

अध्यापन के दौरान स्वामी दुनिया भर के सेमिनारों में शामिल होते और खुल कर भारत सरकार की योजनाओं की आलोचना करते. खासकर वह पंच वर्षीय योजनाओं की आलोचना करते. अपने विचारों के चलते वह इतने प्रसिद्ध हो गए कि उनके विचारों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को प्रतिक्रिया देनी पड़ी थी. उन्होंने कहा था कि स्वामी के विचार वास्तविकता से दूर और अव्यवहारिक हैं. स्वामी को इंदिरा गांधी की नाराजगी भी झेलनी पड़ी और 1972 में IIT दिल्ली की नौकरी गंवानी पड़ी.

स्वामी ने सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 1991 में अदालत का फैसला उनके पक्ष में आया. फैसला आने के बाद वह एक दिन के लिए आईआईटी दिल्ली गए और अपना इस्तीफा दे दिया. अपने बयानों के चलते 1974 में नानाजी देशमुख ने सुब्रमण्यम स्वामी को जनसंघ की ओर से राज्यसभा भी भेजा था.

Subramanian Swamy: इमरजेंसी के दौरान सरकार को जमकर छकाया

इंदिरा सरकार के दौरान लगे आपातकाल में सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार और जांच एजेंसियों को जमकर छकाया. 19 महीने के आपातकाल के दौरान उनके खिलाफ तरह तरह के जाल फंसाए गए लेकिन वह सबको छकाते हुए अमेरिका से भारत में दाखिल भी हुए और संसद सत्र में हिस्सा में लिया और वहां से फिर से गायब भी हो गए. इधर जांच एजेंसिया हाथ मलती रह गईं.

Subramanian Swamy: अटल बिहारी वाजपेयी को नहीं थे पसंद

गांधी परिवार को मुश्किलों में डालने वाले स्वामी ने साल 1999 में अटल सरकार गिराने की कोशिश भी की थी. स्वामी ने सोनिया गांधी और जयललिता की की अशोक होटल में मुलाकात भी कराई थी. हालांकि उमकी यह कोशिश नाकाम हो गई थी और तभी से वह सोनिया गांधी और उनके परिवार के दुश्मन हो गए थे. एक दौर ऐसा भी था जब स्वामी को राजीव गांधी के करीबियों में गिना जाता था. उन्होंने खुले मंच से दावा किया था कि राजीव गांधी ने बोफोर्स घोटाले में एक भी रुपया नहीं लिया है.

स्वामी ने 1998 में जयललिता के सहयोग से बनी एनडीए गठबंधन की सरकार को मुश्किलों में डाल दिया था. जयललिता की जिद थी कि सुब्रमण्यम स्वामी को वित्तमंत्री बनाया जाए और ऐसा नहीं होने पर उन्होंने केंद्र में गठबंधन तोड़ने तक की धमकी दे डाली थी. लिहाजा अटल राज में स्वामी ने कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें जगह नहीं मिल पाई.

हालांकि मोदी सरकार में उन्हें शुरुआती दिनों में सम्मान का भाव मिला लेकिन अरुण जेटली के खिलाफ बयानों के चलते वह एक बार फिर किनारे कर दिए गए. हालांकि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद में उनकी मजबूत पकड़ के चलते उन्हें बाहर नहीं किया लेकिन अब तक उनके कंधे पर कुछ खास जिम्मेदारी नहीं दी गई है. बहरहाल आज कल वह अपने पुराने अभियान में लगे हुए हैं. वह राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता और उनकी डिग्रियों को लेकर खुलकर बोलने से गुरेज नहीं करते हैं.

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