Vikas Dubey Encounter

Vikas Dubey Encounter: कानपुर हत्याकांड में एक के बाद एक नाटकीय घटनाक्रम सामने आ रहे हैं. 8 पुलिसकर्मियों की हत्या से लेकर अब तक सब कुछ किसी फिल्म की पटकथा जैसा है. चाहे पुलिसकर्मियों के विकास से संबंध हों, उत्तरप्रदेश की राजनीति में विकास का प्रभाव हो या उज्जैन में विकास की गिरफ्तारी, सब कुछ वैसा ही है जैसे हिंदी फिल्मों में होता है. इसी क्रम में 10 जुलाई की सुबह विकास के एनकाउंटर की खबर सम्भवतः सबसे अप्रत्याशित घटना थी, यद्यपि इसकी अटकलबाजी पहले से हो रही थी. इसके बाद राजनीतिक टिका टिप्पणियों का स्वाभाविक दौर शुरू हुआ.

एनकाउंटर (Vikas Dubey Encounter) के बाद से विपक्ष हमलावर है विपक्ष ने आरोप लगाया कि बड़े सफेदपोश लोगों का नाम सामने न आये इसलिए यह एनकाउंटर सुनियोजित तरीके से किया गया है. वहीं सरकार की यद्यपि इसपर कोई आधिकारिक टिप्पणी खबर लिखने तक नहीं आयी है, लेकिन सरकार के समर्थकों का बड़ा तबका यही तर्क दे रहा है कि विकास का एनकाउंटर (Vikas Dubey Encounter) एक अच्छी खबर है क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो कई अन्य बड़े अपराधियों की तरह जेल से ही अपना साम्राज्य चलाता रहता. इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में पुलिस की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए जनहित याचिका भी दायर हो गई है. सच्चाई क्या है, पुलिस सही है या ये एनकाउंटर फर्जी है यह जांच के बाद सामने आएगा, जो हर एनकाउंटर के बाद होने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है.

समाज का खोखलापन आया बाहर/ Vikas Dubey Encounter

इस घटनाक्रम में समाज का खोखलापन खुलकर सामने आया है. दबा हुआ जातिवाद उभरकर सामने आ गया विकास की हत्या (Vikas Dubey Encounter) के बाद से ही सोशल मीडिया पर कुछ विशेष तबकों द्वारा उसे आतंकवादी बताकर पूरी ब्राम्हण जाति को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. यह ब्राम्हणों के खिलाफ कुछ तबकों में भरे जहर को दिखाता है. वहीं दूसरी ओर ब्राम्हण जाति के कई लोग पुलिस की बार बार अपील के बाद भी विकास को ब्राम्हणों का नेता बनाकर पेश कर रहे हैं. विकास को उज्जैन के महाकाल मंदिर में पकड़वाने वालों में एक महिला गार्ड यादव थीं इसलिए इस मामले में कुछ लोग यादव बनाम ब्राम्हण की राजनीति का मौका बना रहे हैं. ठाकुर, भूमिहार, यादव कोई भी बिरादरी हो, सभी अपने जाति के अपराधियों को हीरो की तरह पूजती हैं, भले ही सारी जाति को कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता लेकिन एक बड़ा तबका जरूर इस बीमार मानसिकता का शिकार है.

फिर सिर उठाएगा जातिवाद? /Vikas Dubey Encounter

साफ जाहिर है कि राष्ट्रवाद के नाम पर एकजुट दिखता समाज अंदर से कितना खोखला है. ये सभी बातें साफ जाहिर करती हैं कि आज भारत में राष्ट्रवाद का जो प्रभाव है उसके समाप्त होते ही जातिवाद की राजनीति पुनः हावी हो जाएगी. एनकाउंटर राजनीति के समीकरण बदल सकती है विपक्ष लगातार हमलावर है, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की यही सोच है कि वे इसे मुद्दा बनाकर ब्राम्हण वोट बैंक में सेंध लगा सकती हैं. इसकी उम्मीद कम है क्योंकि कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में अपना कोई जनाधार नहीं है, जिसके साथ ब्राम्हण वोटबैंक को मिलाकर भाजपा को चुनौती दी जा सके, जबकि वर्तमान सामाजिक स्थिति में यादव ब्राम्हण गठजोड़ कल्पना से परे है. ऐसे में एक ही दल है जो बदले राजनीतिक समीकरण का लाभ उठा सकता है, बसपा. मायावती ने लेख लिखे जाने तक कोई टिप्पणी इस मुद्दे पर नहीं कि है. (Vikas Dubey Encounter)

राजनीति में संजीवनी की तलाश कर रही मायावती, हाल फिलहाल में भाजपा के प्रति नर्म रुख अपनाए हुए थीं, इसीलिए वो अखिलेश या प्रियंका की तरह तुरंत मुखर होकर विरोध नहीं कर पा रहीं परंतु विकास दूबे के एनकाउंटर के बाद बना माहौल उनके लिए वही संजीवनी बन सकता है जिसकी तलाश में बसपा लगी है. बसपा में नम्बर दो और मायावती के सलाहकार सतीशचंद्र मिश्र इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. भविष्य में जो भी हो समाज का खोखलापन पूरी नग्नता के साथ उजागर हो रहा है.

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